द्वंद
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वो चाहते हैं
कि
मैं गमले की हद में रखूं
अपनी जड़ों को,
और बन जाऊं बोनसाई.
मैं भी नहीं चाहता
हदें पार करना
पर जड़ों को देना होगा पर्याप्त जल
औरशाखाओं को बढने की छूट
और बंद करनी होगी पत्तियों की काँट-छाँट
सिर पर आने दो सीधी धूप
और
हवा के झोंकों को
छूने दो मेरी डालियाँ,
तभी खिल पाएंगे फूल
लग पाएंगे फल
और दे पाऊंगा छाया
वरना बोनसाई से
ये सब कहाँ मयस्सर हैं?
हाँ, एक और बात
जड़ों को रोक सकता है
प्रेम -जल का सिंचन.
दीवारों में कहाँ वो ताकत है?
अथ ........
