Friday, 24 May 2013


द्वंद 
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वो चाहते हैं 
कि 
मैं गमले की हद में रखूं 
अपनी जड़ों को,
और बन जाऊं बोनसाई.


मैं भी नहीं चाहता 
हदें पार करना 

पर जड़ों को देना होगा पर्याप्त जल 
औरशाखाओं को बढने की छूट 
और बंद करनी होगी पत्तियों की काँट-छाँट 

 सिर पर आने दो सीधी धूप 
और 
हवा के झोंकों को 
छूने दो मेरी डालियाँ,

तभी खिल पाएंगे फूल 
लग पाएंगे फल 
और दे पाऊंगा छाया 

वरना बोनसाई से 
ये सब कहाँ मयस्सर हैं?

हाँ, एक और बात 
जड़ों को रोक सकता है 
प्रेम -जल का सिंचन.

दीवारों में कहाँ वो ताकत है?

अथ ........

Friday, 17 May 2013

विजय तो न्याय की होगी
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विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।
चले छल- छद्म के पासे,
युधिष्ठिर पल को हारे भी
अहं में डूब दुस्शासन,
वसन द्रुपदा के फाड़े भी
परन्तु एक सीमा तक चला है पाप का नाटक 
सदा श्रीकृष्ण ने रण
में युग कंस को संहारा है।
विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।

विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।
अँधेरी रात आती जब, 
नहीं होगी सुबह लगता 
विकट आतंक भय का भाव, 
रह रह मन में है जगता 
परन्तु चंद घड़ियों की कहानी यह अँधेरा है।
सदा आलोक ने डटकर अँधेरे को पछाड़ा है।

विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।

Saturday, 11 May 2013


मिलकर उनसे नयन लजाते
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मिलकर उनसे नयन लजाते।

प्राणों की अविकल विह्वलता 
क्षणभर को मिटती सी लगती, 
पर पल में जलती जलती सी 
नूतन एक पिपासा जगती,
भावों के घन उमड़ घुमड़ कर
 बिन बरसे ही रह जाते।
मिलकर उनसे नयन लजाते।

यह कैसा अभिशाप निकट 
होकर दूर खड़े रहते हैं,
जिनसे बहुत बहुत कहना था 
मिलकर मौन बने रहते हैं,
उधर मचलती उनकी आशा 
इधर वेदना हम सहलाते। 
मिलकर उनसे नयन लजाते।
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(14-01-1952)