मिलकर उनसे नयन लजाते
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मिलकर उनसे नयन लजाते।
प्राणों की अविकल विह्वलता
क्षणभर को मिटती सी लगती,
पर पल में जलती जलती सी
नूतन एक पिपासा जगती,
भावों के घन उमड़ घुमड़ कर
बिन बरसे ही रह जाते।
मिलकर उनसे नयन लजाते।
यह कैसा अभिशाप निकट
होकर दूर खड़े रहते हैं,
जिनसे बहुत बहुत कहना था
मिलकर मौन बने रहते हैं,
उधर मचलती उनकी आशा
इधर वेदना हम सहलाते।
मिलकर उनसे नयन लजाते।
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(14-01-1952)
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