Friday, 17 May 2013

विजय तो न्याय की होगी
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विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।
चले छल- छद्म के पासे,
युधिष्ठिर पल को हारे भी
अहं में डूब दुस्शासन,
वसन द्रुपदा के फाड़े भी
परन्तु एक सीमा तक चला है पाप का नाटक 
सदा श्रीकृष्ण ने रण
में युग कंस को संहारा है।
विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।

विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।
अँधेरी रात आती जब, 
नहीं होगी सुबह लगता 
विकट आतंक भय का भाव, 
रह रह मन में है जगता 
परन्तु चंद घड़ियों की कहानी यह अँधेरा है।
सदा आलोक ने डटकर अँधेरे को पछाड़ा है।

विजय तो न्याय की होगी, सदा अन्याय हारा है।

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